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Thursday, September 9, 2010

Chanderi weavers earn name and fame..

their work will be used in commonwealth games..

मध्यप्रदेश के चंदेरी कस्बे का इतिहास सदियों पुराना है और हाथ से बुनी मशहूर चंदेरी साड़ियों को कौन नहीं जानता. चंदेरी की इसी स्थानीय और ख़ूबसूरत कला की झलक कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान नज़र आएगी.

खेलों के दौरान जीतने वाले खिलाड़ियों को मेडल के साथ-साथ विशेष अंगवस्त्रम भेंट किए जाएँगे जिन्हें ख़ासतौर पर चंदेरी के कारीगरों ने बुना है.

मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हरकरघा विकास निगम के उच्च अधिकारी नागेंदर मेहता बताते हैं, "कुछ समय पहले हमने राष्ट्रमंडल आयोजन समिति से संपर्क कर उन्हें एक नमूना दिया था. कारीगरों के काम से प्रभावित होकर उन्हें पदक विजेताओं के लिए अंगवस्त्रम बनाने का ऑर्डर दिया गया है.हमें 15 सितंबर तक इन्हें सौंपना है."

हुनरमंद कारीगरों ने बड़ी मेहनत से इस महीन काम को अंजाम दिया है. चंदेरी में इस काम में जुटे बुनकर नटराज सिंह कोली ने बताया, "काफ़ी मशक्कत का काम है. तान बनवाना, जाला बनवाना और फिर बुनना- एक अंगवस्त्रम तैयार करने में कम से कम डेढ़ दिन लगता है इसका धागा ही काफ़ी बारीक़ होता है."

चंदेरी में काम करे अधिकारी आर ओझा बताते हैं कि कारीगरों ने बुनाई में ही 19वें कॉमनवेल्थ गेम्स लिखा है जो काफ़ी अच्छा दिखता है और साथ ही शेरा भी है. वे कहते हैं कि ये आसान काम नहीं है.

किसी का तो फ़ायदा हुआ

काफ़ी मशक्कत का काम है. तान बनवाना, जाला बनवाना और फिर बुनना- एक अंगवस्त्रम तैयार करने में कम से कम डेढ़ दिन लगता है. खेलों के कारण हमें मज़दूरी का पैसा ज़्यादा मिल रहा है. ऐसे ही काम मिलता रहे तो कारीगरों का भला हो जाएगा. हमारी कला फलती फूलती रहेगी.

नटराज सिंह कोली

बुनकर इस बात से ख़ुश हैं कि एक ओर तो उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय मंच मिलेगा वहीं खेलों की वजह से उन्हें मिलने वाली मज़दूरी का पैसा बढ़ गया है. उन्हें लगता है कि इस काम के ज़रिए चंदेरी का नाम रोशन हो रहा है.

भारत में बुनकरों की बदहाल स्थिति की रिपोर्टें अकसर पढ़ने को मिलती रहती हैं. फिलहाल तो चंदेरी के बुनकर ख़ुश हैं लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों का मेला तो कुछ ही दिनों का है. वे चाहते हैं कि ऐसे ही काम उन्हें मिलता रहें तो कारीगरों के लिए अच्छा रहेगा.

वैसे चंदेरी का काफ़ी गौरवशाली इतिहास रहा है. भोपाल से करीब 300 किलोमीटर दूर और पहाड़ों, झीलों और जंगलों से घिरे चंदेरी कस्बे में बुंदेला राजपूतों और मालवा सुल्तानों की कई इमारते हैं.

कभी राणा सांगा, कभी बाबर तो कभी शेर शाह सूरी ने चंदेरी पर राज किया.19वीं सदी में ये अंग्रेज़ों के अधीन हो गई.इतिहास को पन्ने को पलटते हुए अब ये शहर अपने तरीके से एक फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर मौजूदगी दर्ज कराने को तैयार हैं. कुल 1375 अंगवस्त्रम तैयार करके 15 सितंबर तक दिए जाने हैं.

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