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Sunday, August 15, 2010

A lament on state of Chhatisgarh folk music

from visfot an online hindi magazine..

छत्तीसगढ़ के लोक-गीत अब बालीवुड के रास्ते दुनिया भर में धूम मचा रहे हैं. दूरदर्शन में समृध्द लोक नाटकों, प्रहसनों का और आकाशवाणी में इस तरह की गीतों का खज़ाना भरा पड़ा है. वक्त आ गया है कि अब इन महान रचनाओं को लोगों को सामने लाने के लिए प्रसार-भारती अपना व्यावसायिक दायित्व निभाए, वरना भद्दे वीडियो एलबम और बेतुके छत्तीसगढ़ी फिल्म, यहां के महान कलाकारों का योगदान धूल-धुरसित करके रख देंगे.

चोला माटी के राम के जरिये, साल भर के भीतर ही बालीवुड के धुरंधरों ने दूसरी बार छत्तीसगढ़ के कला व संगीत प्रेमियों को उनके घर में उन्हीं का सामान बेचकर चौंका दिया है. दिल्ली-6 में जब प्रसून जोशी ने ससुराल गेंदा फूल का इस्तेमाल किया तो छत्तीसगढ़ी साहित्य और संस्कृति को लेकर चौकन्ना होने का दम भरने वाले बुध्दिजीवी वर्ग ने उनके इस प्रयास की सराहना कम और आलोचना ज्यादा की. ससुराल गोंदा फूल गाने की पृष्ठभूमि खोज निकाली गई और इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि फिल्म के गीतकार व संगीतकार ने छत्तीसगढ़ के मूल गीतकार व गायकों का जिक्र नहीं करके उनके साथ धोखाधड़ी की, अन्याय किया. गीत के बोल व धुन के साथ छेड़छाड़ का आरोप भी लगा. हालांकि संगीत प्रेमियों का एक बड़ा वर्ग इस बात से कभी सहमत नहीं हुआ और उन्होंने दिल्ली-6 में पारम्परिक ददरिया लोकगीत पर किए गये प्रयोग के लिए प्रसून जोशी व एआर रहमान की भूरि-भूरि प्रशंसा की. पूरे देश के अलावा छत्तीसगढ़ के संगीत प्रेमी इस गीत पर अब भी झूम उठते हैं और उन्हें अपनी माटी की सुगंध देश-विदेश में फैलते देखकर खुशी होती है.

अब छत्तीसगढ़ के साथ-साथ पूरी दुनिया में पद्मभूषण हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर की आवाज में, इसी माटी के संगीत का एक बार फिर डंका बज रहा है. कल 13 अगस्त को रिलीज़ हुई आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म पीपली लाइव का लोक-गीत चोला माटी के राम हर किसी की ज़ुबान पर है. मांदर की थाप में, करमा के धुन पर तैयार इस तात्विक गीत को करीब 3 दशकों से छत्तीसगढ़ के लोग जानते हैं. हबीब के नाटक बहादुर कलारिन में भी इसे सुना जाता है. आमिर खान को इस साहस के लिए बधाई देनी होगी कि उन्होंने गीत को उसी मौलिक स्वरूप में मूल लोक वाद्य-यंत्रों के साथ परोसा. यूं तो सालों साल गाए जाने के बाद लोकगीत पारम्परिक मान लिए जाते हैं, लेकिन इस गीत के बोल लिखने वाले गंगाराम साकेत का नाम भी ईमानदारी से डाल दिया गया है. ससुराल गेंदा फूल गीत के गीतकार प्रसून जोशी और संगीतकार एआर रहमान ने मूल गीत व धुन में कुछ फेरबदल कर दिए थे. गीत को तब भी खूब सराहना मिली, इतनी कि इस नाम का एक टीवी सीरियल भी चल रहा है. ससुराल गेंदा फूल के आने पर छत्तीसगढ़ और यहां के कलाकारों की उपेक्षा की जो बात की गई, चोला माटी के राम.. गीत में वह भी नहीं है. अब तो झेंपने की बारी थोक के भाव में छत्तीसगढ़ी फिल्म और गीत बनाने वालों की है, जो आज तक ऐसा कोई प्रयोग दिखाने का साहस नहीं कर पाए. सिर उन नौकरशाहों, नेताओं भी पीटना चाहिए जो करोड़ों का बजट लेकर राज्य की कला और संस्कृति का उत्थान करने में लगे हैं.

एक तरफ आमिर और प्रसून जैसी प्रख्यात हस्तियां बेधड़क छत्तीसगढ़ के सालों पुराने गीतों को हाथों-हाथ ले रही हैं और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ की फिल्मों और वीडियो एलबम में बालीवुड के ठुमके, लटके-झटके, पहनावे आदि की भौंडी नकल हो रही है. रायपुर में जिस दिन पीपली लाइव रिलीज़ हुई उसी दिन गोविन्दा की एक फिल्म के नकल पर रखे गए नाम वाली एक छत्तीसगढ़ी फिल्म भी प्रदर्शित हुई. एक तरफ देशभर के चैनलों में दर्शक मंहगाई डायन और चोला माटी के राम सुन रहे थे, तो रीज़नल चैनल में चल रहे इस छत्तीसगढ़ी फिल्म के प्रोमो में नहाती, साड़ी गिराती एक नायिका बालीवुड बालाओं से होड़ करने के चक्कर में नाच रही थी. एक समय था जब पद्मभूषण हबीब तनवीर का चरणदास चोर नाटक दूरदर्शन पर आता था, तो आधी रात तक जागकर लोग उसे देखते थे. तीजन बाई की पंडवानी को भी दम साधकर सुनने वाले दर्शक मिलते थे. गली-गली में आकाशवाणी के लोकप्रिय गीत लोगों के ज़ुबान पर होते थे. शुक्रवार की शाम बांस गीत का बेसब्री से इंतजार होता था.

लेकिन अब न दूरदर्शन के वैसे दर्शक रह गये न आकाशवाणी के श्रोता. बालीवुड के गीतों को आज मोबाइल पर लोड किया जा सकता है, इंटरनेट पर सुन सकते हैं, फिल्मों व सीडी के अलावा दिन भर टीवी पर आने वाले प्रोमो के जरिये हमारे कानों में ये गीत बार-बार झनक रहे हैं. लेकिन उन पुराने गीतों व लोकनाट्यों का क्या हो, जो आकाशवाणी व दूरदर्शन की लाइब्रेरी में तो हैं, पर कला प्रेमी उसे देख-सुन नहीं पा रहे हैं. कई दशक पहले जब आकाशवाणी मनोरंजन का प्राथमिक व एकमात्र साधन होता था, राज्य के दबे-छिपे कलाकारों को उसने उभरने का मौका दिया, अब कलाकार इसके मोहताज नहीं रह गए. वे अपना वीडियो एलबम खुद निकाल रहे हैं. उन्हें लगता है कि आकाशवाणी ने उसे ले भी लिया तो उसे पहचान भी क्या मिलेगी. अब तो डीवीडी में गाने सुने व देखे जाते हैं. बिना किसी प्रशिक्षण के, छत्तीसगढ़ के लोक-धुनों के साथ वे प्रयोग करते हैं और बाजार में आ जाते हैं. इन गीतों में छत्तीसगढ़ की मिठास मिलेगी न अभिनय व नृत्यों में लोक तत्वों की मौजूदगी, लेकिन छत्तीसगढ़ को आज उनके इन्हीं उत्पादों के जरिए पहचाना जा रहा है. दूसरी तरफ विडम्बना यह है कि छत्तीसगढ़ को असल पहचान देने वाले सैकड़ो गाने आकाशवाणी की लाइब्रेरी में मौजूद हैं. पर संगीत में रूचि रखने वाले आज के युवाओं को इनके बारे में कुछ पता ही नहीं. टीवी पर क्या आप लक्ष्मण मस्तूरिया या केदार यादव के मधुर गीत सुन या देख पाते हैं? मोर संग चलव रे.. का रिंगटोन कोई उपलब्ध करा देगा आपको. टूरा नई जानय रे का रिंग टोन तो मिल सकता है पर तपत गुरू भई तपत गुरू सुनने के लिए आप कहां जाएंगे?

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद इस उम्मीद को गहरा धक्का लगा है कि राज्य के लोक संस्कृति को नई ऊंचाई मिलेगी. तोर मन कइसे लागे राजा..जैसे एक दो गीतों व फिल्मांकनों को छोड़ दिया जाए तो छत्तीसगढ़ के हर पंडाल पर, हर उत्सव और त्यौहार में राज्य की लोक कला को लहूलुहान होते देखा जा सकता है. यदि आज वीडियो एलबमों व छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अश्लीलता, मार-धाड़, संवाद में बालीवुड से रेस लगाने की कोशिश दिखाई दे रही है तो इसकी बड़ी वजह आकाशवाणी की वह दकियानूसी नीति भी है, जिसके चलते वह अपने खजाने को आज के लोकप्रिय इलेक्ट्रानिक माध्यमों के जरिये लोगों तक पहुंचाने में परहेज कर रही है. इन गीतों के रि-रिकार्डिंग की जरूरत भी महसूस नहीं की गई, जबकि तब और आज की तकनीक और वाद्य-यंत्रों में काफी परिष्कार हो चुका है. आज तो छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के प्रेमी सालों से उन मधुर गीतों को सुनने के लिए तरस गए हैं, जो उन्हें आकाशवाणी से तब सुनाई देते थे जब वह मंनोरंजन का इकलौता साधन हुआ करता था.

दिल्ली-6 और पीपली लाइव में छत्तीसगढ़ी की जय-जयकार के बाद अब तो आकाशवाणी को अपनी गठरी खोल ही देनी चाहिए. इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए कि व्यापक श्रोता समुदाय तक अपनी दुर्लभ कृतियों को पहुंचाने के लिए उनके सामर्थ्य की बात नहीं है. इस तरह के फैसले में कोई दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि प्रसार भारती बन जाने के बाद तो उस पर अपने स्तर से संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी है. आकाशवाणी व दूरदर्शन दोनों में ही विज्ञापन लिए जा रहे हैं, स्टूडियो किराये पर दिए जा रहे हैं और अनेक स्तरहीन कार्यक्रम भी प्रायोजित इसलिए किये जा रहे हैं क्योंकि उससे इन्हें पैसे मिलते हैं. छत्तीसगढ़ी गीतों को भी वे पैसे लेकर संगीत प्रेमियों को उपलब्ध कराएं तो क्या बुरा है. आकाशवाणी के सालाना जलसे में सीडी के स्टाल भी लगे देखे जा सकते हैं. इनमें वे भारतीय व अन्य क्षेत्रीय संगीत की सीडी बेचते हैं, लेकिन अफसोस कि इनमें छत्तीसगढ़ी गीत आपको नहीं मिलेंगे. प्रसार-भारती को न केवल छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए बल्कि अपने मुनाफे के लिए भी, इस विषय में जल्द फैसला लेना चाहिए..क्योंकि अभी छत्तीसगढ़ी संगीत का जादू न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि देश भर के संगीत प्रेमियों में सर चढ़ कर बोल रहा है. ससुराल गेंदा फूल और चोला माटी के राम के बीच करीब डेढ़ साल का अंतराल रहा है. उम्मीद करनी चाहिए कि ये अंतर अब कम हो जाएगा. ठीक समय पर आकाशवाणी भी अपने दायित्व के लिए सजग हो जाए तो फिर बात ही क्या है? ये प्रयास एक दिन छत्तीसगढ़ की गुम होती नैसर्गिक लोक विधाओं को बचा लेंगे वरना छत्तीसगढ़ के लोक-संगीत का कबाड़ा करने के लिए फिल्मकारों व वीडियो एलबम के निर्माताओं के साथ उसे भी जिम्मेदार माना जाएगा

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